फसलों में जिंक का प्रयोग

फसलों की अच्छी बढ़वार, अधिक उत्पादन और गुणवत्ता के लिए सूक्ष्म पोषक तत्व बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इन्हीं में से एक है जिंक (Zinc)। जिंक की कमी हमारे देश की अधिकांश मिट्टियों में पाई जाती है, जिसकी वजह से फसलें कमजोर पड़ जाती हैं और पैदावार घट जाती है। अगर जिंक का सही समय पर और सही मात्रा में उपयोग किया जाए तो फसलें हरी-भरी रहती हैं और उत्पादन भी बढ़ जाता है।

जिंक के कमी के लक्षण

नई पत्तियाँ छोटी और पीली पड़ना

पौधे का विकास रुक जाना

धान में “खैरा रोग”

मक्का में पत्तियों पर सफेद/पीली धारियाँ

गेहूँ में पतली पत्तियाँ और कमजोर कल्ले

फलदार पौधों में कम फूट और छोटे फल

फसलों में जिंक का उपयोग कैसे करें

1 मिट्टी में प्रयोग

जिंक सल्फेट  – 25 किग्रा/हेक्टेयर

अच्छी तरह से मिट्टी में मिलाएँ या बेसल डोज के रूप में प्रयोग करें।

यह रबी-खरीफ दोनों सीजन में उपयोगी है।

2 छिड़काव

जिंक सल्फेट 0.5% (5 ग्राम प्रति लीटर पानी)

छिड़काव करते समय 1% बुझा हुआ चूना  भी मिलाएँ ताकि पत्तियाँ नहीं जलें।

30–35 दिन बाद दूसरा स्प्रे करें (जरूरत होने पर)।

3 जिंक उर्वरक का प्रयोग

खेत में नाइट्रोजन की कुशलता बढ़ाने और जिंक की पूर्ति के लिए ज़िंक कोटेड यूरिया एक अच्छा विकल्प है।

सामान्य यूरिया की तुलना में इसकी उपयोग दक्षता अधिक होती

4 बीजोपचार

जिंक ऑक्साइड या जिंक सल्फेट से बीज उपचार करने पर अंकुरण और शुरुआती वृद्धि बेहतर होती है।

लाभ

1 फसल की बढ़वार में सुधार

2.उपज में 10–30% तक वृद्धि

3.दानों की गुणवत्ता बढ़ती है

4. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है

5. खादों का बेहतर उपयोग

6. फल-फूल आने में बढ़ोतरी


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